लेख/मंथन

सम्मानित हँसी (व्यंग)/लेखक: प्रीत बरार

सम्मानित हंसी / लेखक: प्रीत बरार

जनता अपनी ही चुनी सरकार के आगे किस तरह लाचार हो जाती है इसकी एक बानगी पिछले साल नवंबर में देखने को मिली जब देश के प्रधानमंत्री ने टीवी सेट पे आ के नोटबंदी की घोषणा की। भागमभाग शुरू हो गयी, क्या अमीर क्या गरीब, क्या इमानदार , क्या भ्रष्टाचारी सब घर से निकल भागे , किसी को समझ कुछ नहीं आ रहा था की आखिर हुआ क्या है । रात तो कैसे कैसे लोगों की कट गयी अब अगले दिन की शुरुआत होती है । लोग अभी भी संजीदा दिख रहे थे , अपने पैसे की फिक्र मैं आखिर कैसे नोट बदले जायेंगे । पर जैसे जैसे कुछ दिन बीते लोग व्यंग पे आ गए । शायेद अब लोग हालात को काबू मैं देख रहे थे। कैसे नोट बदलना है सबका जुगाड़ हो गया था । सब अपने अपने तरीके सेट कर लिए थे । प्रधानमन्त्री जी तो लोगों को लाइन में लगा कर जापान चले गए और व्यंग मारा लोगों पे कि घर में शादी है और जेब से पैसे गायब। फिर ये कहा कि देखो मैंने सबको लाइन में खड़ा कर दिया,लोग हंसे की रोयें समझ नहीं आ रहा था। लोगों को भी हंसने का रास्ता आसान लगा, हँसे खूब हँसे, जो लाइन में खड़े हैं भ्रष्टाचारी हैं, ये कहने वाला भी हँसा उसे सुनने वाले भी हंसे जेसे एक अघोषित ठप्पा लग गया हो की कौन भ्रष्टाचारी है और कौन नही। एक लाचार भारतीय का दर्द इस कवि की पंक्तियों में जैसे उभर आया हो,
निर्धन जनता का शोषण है कहकर आप हँसे
लोकतंत्र का अंतिम क्षण है कह कर आप हँसे
सब के सब हैं भ्रष्टाचारी कह कर आप हँसे
चारों ओर बड़ी लाचारी कह कर आप हँसे
हँसी और फूहड़पन में बहुत फर्क है हँसी जो हमें शारीरिक और मानसिक सुख देती है वहीं फूहड़ हँसी हमारे मानसिक स्तर का परिचायक है। हम किस पर और किस बात पर हँस रहे हैं हमारे नैतिक मूल्यों को उजागर करती है।
लोगों की लाचारी पर हँसना, फिकरे कसना इतनी हलकी समझ नुक्कड़ की चाय की दूकान पर तो चल सकती है लेकिन संसद में वह भी देश के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति द्वारा इस आधिकारिक हँसी के सामने चुप रहने के अलावा और कोई रास्ता नहीं। प्रेमचंद ने शायद इसी मनोवेगों के सम्बन्ध में दशकों पहले ही लिख दिया था कि
ज़बान कट नहीं जाती सर फट नहीं जाता
जब जो मुह में आये बोलने में हर्ज़ ही क्या है
मज़ा लेने और मज़ा करने में बहुत फ़र्क है और उस पर भी किसका मज़ा? ख़ुद से कमज़ोर की हँसी उड़ाने में कोई शान नहीं बशर्ते ताकतवर की खिल्ली उड़ाने में बहादुरी ज़रूर है।
कौन सी हँसी कितनी मैली है कौन सी कितनी उजली, किस हँसी में क्रूरता है कौन सी वात्सल्य से भरी लेकिन जब संसद में सबसे शक्तिशाली व्यक्ति ये कह कर हँसता है कि देखो मैंने माताओ- बहनों की छुपी हुई तिजोरी से सारा काला धन निकलवा दिया इस हँसी को किस श्रेणी में रखा जाये निश्चित करना मुश्किल है ।
इन सब बातों को सुनकर ये विचार भी मन में आता है कि कौन सी हँसी को क्षमा किया जा सकता है और कौन सी हँसी पर आवाज़ बुलंद की जा सकती है ये सब विभिन्न मानसिक स्तर के विद्वानों के लिये अनुसन्धान का विषय हो सकता है। लेकिन इसे तय करने का एक आधार ये भी हो सकता है कि क्या वो किसी को समाज से अलग तो नहीं करती, अगर वह किसी को किसी समुदाय को अपमानित कर रही है तो निश्चित ही उस हँसी में शामिल होना जुर्म है।

यहां हँसने के लिये कोई कानून नहीं है और यदि कोई कानून होता तो शायद सबसे ज़्यादा मामले हमारे नेताओं पर दर्ज होते। किसी भी बात पर व्यंग्य करना यानि की मानसिक संवेदनाओं के अंतिम छोर तक पहुंचना है। लगता है जैसे लोगों को हँसाने के लिये अपमान का तड़का लगाना बहुत ज़रूरी है।
विदेशों में हँसी बहुत क़ीमती है लोगो ने वहाँ हँसने के लिये क्लब बनाये है क्योंकि वहाँ की जनता किसी के दुःख पर हंसना नही जानती लेकिन भारत में ये कुटिल हँसी किसी भी चौराहे से लेकर गली मुहल्लों के घरों की दीवारों तक में कानाफूसी के रूप में मिल जायेगी अब इस हँसी का स्टैण्डर्ड हाई हो गया है अब ये हमारी संसद में भी शोभायमान है ।

लेकिन इन सबमें लोगो की लाचारी पर व्यंग्य करना मनोवेगों का सबसे निचला स्तर कहा जा सकता है।हँसी अब हिंसा का रूप लेती जा रही है। जितने तीख़े हमारे व्यंग बाण होंगें हम उतने ही शिक्षित और सभ्य कहलाएंगे। हमारा शिक्षित होना हमे ये अधिकार देता है कि हम अपने से कम सामाजिक हैसियत वाले तबके पर कितने ओछे व्यंग्य बाण चला सकते है और उस पर भी यदि शिक्षा के साथ हम समाज के उच्च वर्ग से या किसी शक्तिशाली पद पर आसीन है तो अशिक्षितों और ग़रीबो पर हंसने का हमें लाइसेन्स बड़ी आसानी से हासिल हो जाता है।

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