लेख/मंथन

ये गौरक्षक नहीं लाइसेंसी गुंडे हैं! आपकी आत्मा को झकझोर देगा ये लेख। लेखक: सयैद सलमान अहमद

पृथ्वी पर बहने वाले मानवीय रक्त ने कई बार पुकार-पुकार कर कहा है कि शरीर में बहने वाला रक्त एक ही रंग रखता है, सदा से लाल है और ऐसा ही रहेगा..लेकिन गौर से देखने पर पता चलता है कि रक्त का रंग पानी की तरह रंगहीन ही है..अगर ऐसा ना होता तो गौ-रक्षक के नाम पर गुंडों की फ़ौज कल अलवर में 55 साल के एक व्यापारी को महज गौ-तस्करी के शक में पीट पीट कर मार नहीं डालती..जिस भीड़ को बचाने का काम करना चाहिए था, वो खुद हत्यारा ना बन जाती..और जिन खाकिधारियों पर लोगों को सुरक्षा देने का ज़िम्मा है, एक मरते शख्स को देख कोना में मुंह दबाकर दांत नहीं निपोर रही होती..सोचिये, मरने वाले शख्स ने दूध प्राप्ति के लिए गायें खरीदी थी और उसके पास प्रमाण के तौर पर सरकारी रसीदें भी थी..जिस देश में धर्म एक धंधा और फलता-फूलता उद्योग है, वहां मानवीय संवेदनाओं का शीघ्रपतन होना स्वाभाविक है..मगर इतनी जल्दी जल्दी होगा इसका कतई अंदाज़ा नहीं था..ऊना, उडुप्पी, कुरुक्षेत्र, अलीगढ और गुड़गांव के बाद अलवर ने धर्म के नाम पर आस्था के ढोल की चमड़ी उधेड़ कर रख दी है..

इतना बड़ा काण्ड हुआ और स्टूडियो के तोपची ट्रिपल तलाक और निर्मल बाबा का दरबार सजाए बैठे रहे..आखिर हम कौन से समाज की कल्पना कर रहे हैं ? धर्म और आस्था के नाम पर फूहड़ता का कौन सा माला जप रहे हैं ? याद रखो ढिठाई और गुडागर्दी का आतंक सच का मुंह नहीं सिल सकेगा..आस्था के नाम पर क़त्ल की कालिख से धर्म का मुंह पोतने वाले साहब माफ़ कीजियेगा..आप धार्मिक नहीं मार्मिक हैं..होशियार नहीं मक्कार हैं..आपकी शुद्ध मक्कारी और लिजलिजे चेहरे का नाकाब उतर चुका है..दरअसल आप आस्था के नाम पर आडंबरों का जो संसार नाप रहे हो..वो खोखली आस्था को छिपाने वाला बस एक पर्दा भर है..जिसे देख कर हर कोई घिन्न से भर आए..आपकी फटी आस्था और दरिद्रता का ओछापन निर्वस्त्र हो गया है..याद रहे जब संतई की सत्ता के लिए तलवार उठने लगें..गोली चलने लगे, गड़ासे चमकने लगे..तो महाराज भी मवाली बन जाता है..इंसानी हड्डियों को तोड़ना बंद करो..

आखिर गौ-तस्करी के शक में क्यों पीटा जा रहा है, क्यों घेर कर मारा जा रहा है? गाय के नाम पर बीच बाजार चमड़ी क्यों उधेड़ी जा रही है ? क्या ये बर्दाश्त नहीं की 14% वालों की हिम्मत कैसे हुई कि वो 80% वालों के सामने से गाय लेकर निकल पड़े ? ध्यान रहे आस्था के बंधन जब ढीले पड़ने लगते हैं तो इंसान का अहंकार ही उसे कचोटने लगता है..मनुष्य को मनुष्य  के रूप में परखने का प्रयास और संकल्प निरंतर चलता रहा है..दर्शन, धर्म, राजनीति, चेतना और समाजशास्त्र ने अपने अपने ढंग से इसकी व्याख्या की है..सिद्धों, संतों, महात्माओं, मौलानाओं, मौलवियों और अवतारी पुरुषों ने बार बार कहा कि मनुष्य-मनुष्य में अंतर नहीं है..सभी ने अपने अपने ढंग से मानवीय कल्याण का बीड़ा उठाया, लेकिन धरती आज भी किस तरह जाति, धर्म और संप्रादाय के नाम पर विभाजित हो रही है..अलवर इसका जीता-जागता सबूत है। मेरे और तेरे के भ्रम ने कई बार रक्त की लालिमा में मानवीय मूल्यों की कहानी लिखी और मिटाई..धर्म और राजनीति के मणि-कांचन सहयोग ने गोलाकार धरती के मानचित्रों को कई बार बनाया और मिटाया..लेकिन मनुष्य को मनुष्य के रूप में परखने की कसौटी कभी बन नहीं पाई..और असंख्य सिद्धांतों की खिचड़ी में भी नरकंकालों को भरपेट भोजन नहीं मिल पाया..

ऐसे में महाभारत का एक प्रसंग आता है..जब पांड़व पुत्र सरोवर के किनारे अचेत होते हैं, तब उन्हें जीवित करने के लिये यक्ष, युधिष्ठिर से एक प्रश्न ये भी पूछता है कि दुनिया में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है..तब धर्मराज युधिष्ठिर जबाब देते हुऐ कहते है – इस दुनिया में रोजाना हजारो लोग मरते हैं..और फिर भी हम यह सोचकर जीते हैं कि हमारी मौत कभी नही होगी न हमारे साथ कुछ गलत होगा..लेकिन याद रखियेगा आज आप उस भीड़ के हिस्सा बन रहे हैं तो कल वही भीड़ आपके सामने भी हो सकती है।

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