लेख/मंथन

गेस करो कश्मीर का दुश्मन कौन है ? बकैती न करना/ सयैद सलमान अहमद की कलम से

कश्मीरर के श्रीनगर में लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव ने जो तस्वीर पेश की है..वो लोकतंत्र के ललाट पर शर्म का तिलक लगाती एक सच्चाई है..कश्मीरियों के चुनाव बहिष्कार के बाद सिर्फ 6.7% मतदान बताता है कि घाटी में कुछ भी ठीक नहीं है..और पानी सिर से 5 फुट ऊपर बह रहा है..हिंसा में 7 लोगों की जानें भी गई है..सिर्फ 6.7% मतदान का मतलब समझते हैं आप ? मतलब कश्मीर की करीब 93.3% जनता केंद्र और राज्य सरकार से बगावत कर चुकी है..ये केंद्र और कश्मीर की सरकार के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं..

 अंतर्राष्ट्रीय पटल पर भी भारत की साख कमज़ोर होगी..कश्मीर की तरफ आंख गड़ाए पाकिस्तान को मौक़ा मिलेगा..और वो यूएन में इसे भुनाने की कोशिश करेगा..ये कहते हुए कि कश्मीर की 94% अवाम भारत सरकार के खिलाफ है..मुझे याद है कि पीएम नरेंद्र मोदी ने बीते 15 अगस्त को लालकिले की प्राचीर से बलूचिस्तान का मुद्दा उठाया था..हालांकि  बलूचिस्तान, पाकिस्तान के कब्ज़े में है..फिर भी पीएम की तरफ से की गई मुनादी महज भावनाओं को कैश कर जन-समर्थन की तिजोरी भरना था..पर अफ़सोस है कि जो कश्मीर अपना है..भारत का अखंड हिस्सा है..उसकी केंद्र ने कभी कदर नहीं की..कभी कश्मीरियों को भरोसे में लेने की कोशिश नहीं की..ख़ास कर पिछले दो-तीन सालों में कश्मीर के हालात बद से बदतर हुए हैं..और महज 6.7% मतदान होना बताता है कि कश्मीर घाटी के मुसलमान इस बार भारत के साथ नहीं हैं..पहले केे मुकाबले इस बार हालात ज्यादा खराब हैं..लोग खुलकर आतंकियों का समर्थन भी कर रहे हैं..वक़्त वक़्त पर पाकिस्तानी झंडा लहराना बताता है कि उनके दिल में हिंदुस्तान और हुकूमत के प्रति कितनी नफरत भर चुकी है..क्योंकि इस बार जंग कश्मीर की नहीं..आज़ादी की है, एक वक़्त तक जो कश्मीरी भारत के साथ रहना चाहते थे, अब ज़्यादातर आज़ाद कश्मीर की मांग पर अड़े हैं..

जाहिर है सरकार इसे सैन्य ताकत से निपटने की कोशिश करेगी..कर भी रही है..लेकिन सैन्य ताक़त, खून-खराबा कश्मीर समस्या का कोई हल न कभी था और न कभी होगा..क्योंकि जब किसी राज्य की 100% जनता सरकार के खिलाफ हो जाए, तो उसे सैन्य ताकत से कुचलकर कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता..फिलहाल दो रास्ते हैं..एक तो सरकार कश्मीर के स्टेक होल्डर्स से बिना किसी हुर्रियत की मध्यस्थता के प्रत्यक्ष और सीधे तौर पर बात करे..और आपसी समन्वय बनाकर उन्हें विश्वास में लेने का प्रयास करे..कश्मीरियों के साथ आमने-सामने टेबल पर बात हो..उनके दुःख-दर्द को सुनने का प्रयास हो..राजनितिक दखल कम हो..और दूसरा, सेना को घाटी से पूरी तरह से हटाकर बॉर्डर पर तैनात कर दिया जाए..और कश्मीर घाटी को सिर्फ जम्मू-कश्मीर पुलिस के हाथ में सौंप दिया जाए..उनकी तादाद भी ज़रुरत के हिसाब से रखी जाए..ताकि आवश्यकता से अधिक अर्धसैनिक बल की तैनाती की वजह से उनके दिल में कोई भय पैदा न हो..ये कश्मीरियों का विश्वास जीतने का सबसे श्रेष्ठ और साहस भरा फैसला होगा..फैसला कठिन ज़रूर है लेकिन इसके नतीजे बेहद चमत्कारिक और चौंकाने वाले होंगे..

परिणामस्वरुप कुछ महीनों में ही कश्मीर के हालात अपने आप सामान्य हो जायेंगे..सेना हटेगी तो एस्पा भी बेमतलब हो जाएगा..जो कश्मीरी लोगों के घाव पर मरहम का काम करेगा..इसके लिए राज्य और केंद्र सरकार को आपसी सहयोग और बेहतर ताल-मेल से काम करना होगा..अगर कट्टरपंथ को रोकना है..तो रणनीतिक तौर पर एक नया और ऐतिहासिक फैसला लेना होगा..भारत के साथ-साथ कश्मीर की विशिष्टता के लिए भी ये बेहद ज़रूरी होगा।

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