लेख/मंथन

​मैं हूँ पहलू खान… ढूंढ लिया हो तो बताओ मेरा क़ुसूर! लेखिका: हरप्रीत कौर

मैं हूँ पहलू खान….. मैंने नंगी आँखों से इंसानियत के चीथड़े होते देखे हैं, मैंने हैवानियत का नाच बीच बाजार देखा है, मेरे रोम रोम ने चीख चीख कर सवाल किया था ….आखिर मेरा क़ुसूर क्या है? लेकिन हैरत की बात तुम बस मुझे मज़े के लिए मार रहे थे.. शायद ये भी सही से नही जान पा रहे थे की किस लिए तुम पर ये बेहिसाब शैतानियत सवार है जो मुझे लातों, बेल्टों से पीटने पर भी खुश नही हो पा रही। फिर तुमने पत्थरों से इंसानियत पर मेरे बचे हुए यकीन को भी मारा डाला था,  उन पत्थरों पर लगा मेरा ख़ून अभी भी तुमसे तड़प कर, यही सवाल पूछता है आख़िर मेरा क़ुसूर क्या था ?

मेरा बिलबिलाता हुआ ख़ून से लथपथ जिस्म बीच बाजार पड़ा था तुम मुझे ज़िंदा जलाने को भी तैयार थे, मेरा जिस्म तो शायद जल जाता ,लेकिन मुझे जलाने के बाद क्या तुम्हारी रूह तुम्हे चैन से सोने देती ? क्या उस रात तुम्हे चैन की नींद आयी जैसी तुम रोज़ सोते थे ? क्या तुम्हारे ख़्वाब आज भी उतने ही सुनहरे, उतने पाक़ थे जैसे मेरे ख़ून के छींटे पड़ने से पहले थे? क्या तुम्हारे दिन वैसी ही मस्ती में चूर हैं जैसे मुझपे क़हर बरपाने से पहले थे। दिन में जब खाने बैठोगे तो सोचोगे क्या ये रोटी अभी भी उतनी ही मीठी है जितनी मेरे ज़ख़्मों पर चोट पर चोट मारने से पहले थी ? क्या मेरे खून के छींटों से सनी  तुम्हारी रातों में मेरा ख्याल तुम्हारे चीथड़े हुए दिल से ये सवाल नही पूछेगा कि अपने परिवार को पालने के लिए सोचना इतना बड़ा जुर्म था मेरा… की जिसकी सज़ा पीट पीट कर मार डालना है…. ये तो तुमने खुद अपने ही बनाये संविधान का गला घोंट दिया की उसमें गुनाह की सज़ा देने की हिम्मत नहीं, अगर मैं गुनाहगार था तो पूरी शान से साबित करते फिर जो हिंदुस्तान का क़ानून मुझे सज़ा देता मैं उसे क़ुबूल करता।

मेरे घर में पलती हुई गायों को कितने दुलार से मैंने अपना पेट काट कर भी पाला… ये तो तुमने न जाना था,  तुम जान भी नहीं सकते थे क्योंकि तुम्हारी धर्म के बोझ तले दबी ज़ेहनियत ये नहीं देख सकती की कोई “पहलू खान” भी कभी गाय की सेवा कर सकता है,  तुम्हारी आँखें ये भी नही देखती की कब तुम्हारे ही भाई बूढ़ी होने पर उन्हें रास्ते पर भटकने के लिए छोड़ देते हैं तब वो ज़हरीला कूड़ा खाकर अपनी मौत की तरफ बढ़ती हैं…. तुमको अगर सच में गौरक्षा ही करनी होती तो क्या तुम उन परिवारों को ना समझाते ऐसा करना ज़ुल्म है, महापाप है… अगर गौरक्षा ही तुम्हारा मक़सद है तो कभी तुमने तहक़ीक़ात की है कि सरकारी गौशालाओं में हर साल इतनी गायें क्यों मरती हैं?

आज अपनी मौत को सामने देखकर मैं समझ गया कि तुम्हारा मक़सद कुछ और ही है,  आज मैं जान गया लोकतंत्र क्या है, भाईचारा किस ज़ेहनियत की पैदाइश है।

अगर तुमने कभी अपने प्रिय प्रधानमंत्री की बात सुनी होती की सबसे ज़्यादा गायों की मौत ज़हरीली प्लास्टिक की पन्नियाँ खाने से होती है तो शायद तुम गौरक्षा के लिए एक दल बनाते जो कूड़े में प्लास्टिक फेंकने वालों को समझाता की ये गलत काम है जिससे हमारी गौमाता की मौत होती है… लेकिन इसकी बजाय तुमने एक इंसान को ज़ोर ज़बर के रास्ते पीट पीट कर मार डालना बेहतर समझा।

एक बार मैंने कहीं पढ़ा था तुम्हारे प्यारे बापू ने “गौरक्षा” का नाम बदलकर “गौसेवा” कर दिया था क्योंकि रक्षा शब्द से ही उन्हें हिंसा की बू आती थी,  जिसकी रक्षा करनी हो उसके लिए साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनानी पड़ती है…लेकिन जिसकी सेवा करनी हो उसके लिए अपने कर्म को कसौटी पर तपाना पड़ता है.. मुझे आज याद आ रहा है उन्होंने कहा था कि गौसेवा के लिए हमे किसी की जान लेनी नहीं बल्कि अपनी जान क़ुर्बान करनी है, तभी गौमाता के लिए हमारा निस्वार्थ प्रेम समाज में भाईचारे और प्यार की नींव रखेगा।

आज अपने हिन्दुस्तानी भाइयों के सामने यूँ बेजान और बेदम पड़े हुए मैं उस परवरदिगार से दुआ करता हूँ ए मालिक़! चाहे मेरी जान ले ले लेकिन गौरक्षा के नाम पर फैली इस नफ़रत को मेरे हिंदुस्तान से ख़तम कर दे।

आमीन……

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