लेख/मंथन

किसान नंगा या मिडिया-सरकार नंगी ? लेखकः सैयद सलमान अहमद 

जब इंसानन नंगा हो जाए तो क्या करेंगे आप..ज़ाहिर है नंगे से दूरी बनाने की कोशिश करेंगे..लेकिन कई बार नंगा होना, सरकारों के बदन पर सजे लिजलिजे और बदबूदार पोशाक को नोचकर नंगा करने की एक हकीकत भी है..तमिलनाडु के किसान भी नंगे हुए, सरकार को नंगा किया, लेकिन डिबेट की दहलीज पर बैठी मिडिया ने नंगे किसानों के लिए अपना दरवाज़ा बंद रखा..जानते हैं क्यों ? क्योंकि मिडिया भी नंगा है..फर्क सिर्फ ये है कि किसान पोशाक बिना नंगा और मीडिया हज़ारों पेवन लगा पोशाक पहन के नंगा है..तमिलनाडु के किसान दिल्ली में पिछले 28 दिन से धरना प्रदर्शन कर रहे हैं..मगर सुनवाई नहीं हो रही..किसानों ने इंसानी खोपड़ी रखकर प्रदर्शन किया, चूहों को मुंह में दबाकर आवाज़ बुलंद की, बावजूद इसके जब सरकार आंखों पर राष्ट्रवाद की पट्टी और कान में देशभक्ति की रुई ठूंसे रही, तो आक्रोशित किसान दिल्ली में पीएम ऑफिस के सामने कपड़े उतार कर नंगे हो गए..न्यूड को डूड लोग पोर्न में देखना तो पसंद करते हैं, लेकिन अन्नदाता की न्यूडिटी से लोगों को घिन्न आती है..

दरअसल किसान केंद्र से क़र्ज़ माफ़ी, 40 हज़ार करोड़ रुपये के सूखा राहत पैकेज और कावेरी प्रबंधन बोर्ड के गठन की मांग कर रहे हैं..महीनों से आंदोलन कर रहे लेकिन कोई सुनवाई नहीं..फिलहाल सरकार और मीडिया ने गोरक्षा और ट्रिपल तलाक से निकाह कर लिया है..देशभर के किसानों पर तकरीबन 12,60,000 करोड़ का क़र्ज़ है..जबकि पिछले तीन बरस में सरकार ने उद्योगपतियों को 17,15,00,000 करोड़ की रियायत दी है..दरसल किसान होता ही है क़र्ज़ के बोझ तले दबकर मर जाने के लिए..लेकिन क्या इसके लिए सिर्फ सरकार ज़िम्मीदार है..तो जवाब है नहीं..मिडिया भी इसमें बराबर की हिस्सेदार है। 
हकीकत ये है कि आज के परिपेक्ष में लोगों को फुसलाना ही मिडिया और सरकारों का सबसे बड़ा शास्त्र बन गया है..फुसलाने की पद्धति के तहत ही जनता के लिए दर्जनों झूठे आश्वासन और योजनाओं की घोषणा की जाती है..यही वजह है कि अविश्वस्त घोषणाओं का अंबार लग गया है..दरअसल फुसलाना का पर्याय है प्रोपगैंडा करना..चैनलों ने भी खबर और प्रोपगैंडा में भेद करना बंद कर दिया है..प्रोपगैंडा जब खबर बन जाता है तो दर्शक खबर नहीं प्रचार अभियान देखते हैं..ख़बरों में आने वाला रेड-अलर्ट आय दिन की खबर है..इसका अर्थ है आतंकवाद हमारे घर की चौखट तक पहुंच चुका है असल में ये आधिकारिक तौर पर मेनुपुलेटेड भय है, पागलपन है..जिसमें दिमाग की धुलाई करके ये बताने की कोशिश होती है कि, अलकायदा और ISISI सबसे बड़ा ख़तरा है..जबकि ख़तरा इन दोनों से नहीं अमेरिका और इज़राइल से है।

ये जनतंत्र की जीत नहीं पराजय है..जनतंत्र के क्षय के महाख्यान की अंतिम बेला है..सरकार के कामों पर बहस कम हो रही है, गुणगान भर भर के हो रहा है, सरकारी नीतियों के भूमंडलीय परिदृश्य को छिपाया जा रहा है..विकास के ठोस मुद्दे और नीतियां गायब हैं..आज चैनल ज़्यादा हैं लेकिन सूचनाएं कम हैं, ख़बरों का अकाल है..कथित ख़बरों की छाई बोरियत को दूर कर रहा है..ये ‘जयवाद’ का युग है जो सिर्फ आनंद और उपभोग का प्रदर्शन हैं..चैनल में काम कर रहा एक बड़ा वर्ग जनता के गुस्से और असंतोष को राष्ट्रवाद की ओर मोड़ने और विचारों को नियंत्रित करने का काम कर रहा है। 

भारतीय टेलिविज़न पत्रकारिता की सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि उसमें खबर और प्रोपगैंडा में फर्क करने की तमीज अभी तक पैदा नहीं हो सकी है..टेलिविज़न पर कैमरों के सामने दिया गया बयान स्वंय में प्रमाण होता है..वह बयान में दिए तथ्यों की अपनी खोज के ज़रिये पुष्टि नहीं करता है..पार्टी प्रवक्ता सच बोल रहा या नहीं, बयान खबर है या प्रोपगेंडा इससे चैनल को कोई लेना देना नहीं..ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में तथ्यहीन ख़बरों के लिए रिपोर्टर को नौकरी से हाथ तक धोनी पड़ती है..टेलिविज़न ने सरकार के नीतिगत फैसलों पर सवाल उठाने बंद कर दिए हैं..वे खबरें चैनलों से गायब हैं जो सरकार की इमेज खराब कर सकती हैं..ये चैनलों के चरण-संस्कृति का नया उभार है जो जनतंत्र के नए आख्यान को नॉनसेंस में परिभाषित कर रहा है..ये एक ऐसा नॉनसेंस है जिसमें चरण नहीं है फिर भी वंदना करने की संस्कृति पनप रही है।

टेलिविज़न इस युग का नया संस्कार बना रहा है..सार्थक बहस, शान्ति की बजाय शोर, खोखलापन और सांस्कृतिक शून्य पैदा कर रहा है..अब हम बीसवीं सदी के एमटीवी बकरा हैं..’फुल्ली फ़ालतू’..कलम के सिपाही दरबारी बन गए हैं..प्रसंशा आज के युग की आलोचना है..आवश्यकता होने पर प्रसंशा बुरी चीज़ नहीं है..लेकिन चाटुकारिता प्रसंशकों को विदुषक बना देती है..टेलिविज़न को चुटुकारिता पसंद है और सरकार को चाटुकार पत्रकार..आज का टेलिविज़न गला फाड़ के दावा करता है कि वो सच दिखा रहा है, लेकिन असल में वो झूठ बोल रहा होता है..क्योंकि चारणवृत्ति सच से परहेज़ करती है..उसे सच नहीं काल्पनिक सच पसंद है।
टेलिविज़न में दिखना महत्वपूर्ण है सत्य महत्वपूर्ण नहीं..दिखना असल में वफादारी की मांग करता है, भाषा को मैन्युपुलेट करता है, ब्रांड प्रोमोशन की रणनीति को श्रेष्ठ मानता है..इसी रणनीति के मुताबिक वो अपने माल को बढ़िया और दुसरे के माल को घटिया बताता है..लेकिन असल जनतंत्र को नॉनसेंस से बचाना होगा..वरना ये नाटकीय राजनीति हमें मूर्खता की भूलभुलैया में ले जा सकता है..और फिर हम नंगे किसानों को अपनी नंगी आंखों से भी कभी देख नहीं सकेंगे।

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