लेख/मंथन

भारत के स्वर्ग को ये क्या हो गया/ लेखकः डॉ० मुशीर अहमद खान

लेखकः डॉ० मुशीर अहमद खान

कहते हैं लोकतंत्र लोगों से बनता है, इसीलिए इसे जनतंत्र भी कहते हैं, जनता का शासन।  लोकतंत्र में जितना जनता की भागीदारी बढ़ती है उतना ही लोकतंत्र मजबूत होता है। भारत का लोकतंत्र धीरे धीरे अपनी परिपक्ता की तरफ जा रहा था कि अचानक कई तरह की ताकतें इसे अपनी गिरफ्त में ले लीं और  इसको अपनी अलग दिशा देने में लग गई, और अब नतीजे हमारे सामने कश्मीर के रूप में सामने है।

लोकतंत्र के इतिहास में इससे काला दिन और क्या होगा  जब कश्मीर के श्रीनगर के लोकसभा उपचुनाव में जहां बड़े-बड़े महारथी चुनाव लड़ रहे थे, ( कश्मीर के ही पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला , वर्तमान मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती  के भाई,  फिर भी चुनाव में सिर्फ 6.5%   जनता ने ही अपने मताधिकार का प्रयोग किया,  आप उन  93.5%  जनता के बारे मे क्या कहेंगे जिन्होंने लोकतंत्र का खुले आम  बहिष्कार क्यों किया। उन्हें जनता की चुनी हुई सरकार में अब भरोसा नहीं रहा, क्यों हम कश्मीर की जनता का भरोसा जीतने में नाकाम  हुए इन पहलुओं पर गहराई से सोचने का वक्त अब आ गया है।

 

कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है इसमें कोई दो राय है ही नहीं, लेकिन कश्मीर की जनता का क्या करें जो भारतीय लोकतंत्र की प्रतिक्रिया को नकारने पर आमादा है! क्या वजह होगी? हम सब को बखूबी मालूम है कश्मीर पिछले कई दशकों से हिंसा की मार झेल रहा है इस हिंसा में पड़ोसी देश पाकिस्तान का हाथ भी रहा है यह जगजाहिर है, पर हमारे देश के राजनेताओं का यहां क्या कहे जो वहां की जनता का भरोसा जीतने में नाकाम रहे कश्मीरी युवा को शिक्षा रोजगार आदि से जोड़ने के बजाए हम उनको पत्थर बाज बनते देखते रहे उन्हें  देश द्रोही होने का भी आरोप लगाते रहे।हम उनके दिलों को न जान पाए की आखिर कश्मीर का युवा क्या चाहता है। या जान कर भी उनकी तरफ वहां की सरकार ने ध्यान नहीं दिया। बीमारी जानने के बाद भी अगर इलाज संभव ना हो सके तो फिर कश्मीर की शांति की कल्पना कैसे कर सकते हैं । अगर लोकतंत्र में जनता परेशान होती है तो जनता शासन के और भी पहलुओं के बारे में भी सोचेगी और आकलन भी करेगी की  कौन से साशन में उन्हें ज्यादा फायदा है।

लोकतंत्र को दिशा से भटकाने में हमारे देश के मीडिया का अहम् योगदान रहता है।  एक वक्त था जब मीडिया या पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था पर पिछले दशक से जब से लोगों का मीडिया में कार्पोरेट लोगों का दखल  बढ़ा है और बिकाऊ मीडिया,  कंपटीशन मीडिया, टीआरपी मीडिया, खबरों को तोड़ना, नमक मिर्च लगाना इससे को लेकर भारतीयों के मन में मीडिया को लेकर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, लोगों का   सोचने का एक नया पैमाना विकसित हुआ है ।

एक तरफ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एक दुसरे से आगे निकलने की स्पर्धा है चाहे किसी को भी इसकी कीमत चुकानी पड़े। तो  दूसरी तरफ सोशल मीडिया का बेज़ा इस्तेमाल भी शुरू हो गया है, सोशल मीडिया का उपयोग राजनीति दल  अपने सुविधानुसार जनता को अपने पक्ष में करने के लिए करने लगी हैं। मीडिया का गलत इस्तेमाल से राजनैतिक दलों का फौरी फ़ायदा तो हो सकता है परइसके दूरग्रामी परिणाम खतरनाख है मीडिया का उतावलापन एक दिन लोकतंत्र की चूल्हे हिलाकर रख देगा ।

लोकतंत्र  में सिर्फ चुनाव होना और चुनाव जीत का सरकार बना लेना ही बस नहीं है। जनतंत्र में  संविधान द्वारा दिया गया  जनता के मौलिक अधिकारों का अगर हनन होगा, अदालत  अगर इंसाफ नहीं करेगी, सरकार भेदभाव पूर्ण कार्य करेगी, सरकार धार्मिक कार्यों में लगेंगी तो इसका खामियाजा भी देश को भुगतना पड़ेगा लोगों का भरोसा लोकतंत्र में कम होगा कश्मीर वाला हाल और भी जगह हो सकता है इसलिए राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं से अपील है कि लोकतंत्र को बचाने के लिए आगे आए और गहन विचार करें कि देश में ऐसे हालात क्यों होते जा रहे हैं अपनी अपनी जिम्मेदारी को समझें जनता के अधिकारों की लड़ाई लड़ें तभी कश्मीर में जनता के भरोसे को जीत पाएंगे और उन्हें लोकतंत्र में भागीदार बना पाएंगे।

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