लेख/मंथन

‘मैं आपके शहीद की बेटी नहीं’ //गुरमेहर कौर

गुरमेहर कौर एक बार फिर से ख़बरों में हैं. इस बार गुरमेहर ने उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोल कर रहे लोगों के लिए एक ब्लॉग लिखा है. इस ब्लॉग में वो सबको बता रहीं हैं कि उनके बारे में मीडिया में जो राय बनी है वो वैसी नहीं हैं. गुरमेहर ने अपनी फेसबुक वॉल पर एक ब्लॉग शेयर किया है. आप उसका हिंदी ट्रांसलेशन यहां पढ़ सकते हैं…

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गुरमेहर लिखती हैं :
“मैं कौन हूँ?
इस सवाल का जवाब मैं पिछले कई हफ़्तों में दे सकती थी. पर अब मुझे ज्यादा यकीन नहीं है.
क्या मैं वो हूं, जो ट्रोल्स सोचते हैं?
क्या मैं वो हूं, जो मीडिया ने मेरे बारे में दिखाया है?
क्या मैं वो हूं, जो वो सेलेब्रिटी मेरे बारे में सोचते हैं ?
नहीं, मैं इन सभी में से कुछ भी नहीं हो सकती हूँ. जिस लड़की को आपने टीवी स्क्रीन्स पर, हाथों में एक प्लकार्ड लिए, फोन कैमरा के छोटे से लेंस पर आंखें तरेरते हुए देखा , वो बिल्कुल मेरी तरह दिख रही थी. उसके विचारों का तीखापन जो उसकी फोटो में चमक रहा था , कहीं न कहीं वे मेरे निशान थे. वो गुस्से से लाल दिखती है, मैंने खुद को उससे थोड़ा जोड़ा लेकिन “ब्रेकिंग न्यूज़ हेडलाइंस” ने कुछ अलग ही कहानी बताई. वो हेडलाइंस मैं नहीं हूं.
शहीद की बेटी
शहीद की बेटी
शहीद की बेटी
मैं अपने पापा की बेटी हूं. मैं अपने पापा की गुलगुल हूं. मैं उनकी गुड़िया हूँ. मैं 2 साल की उस आर्टिस्ट जैसी हूं जिसे शब्दों का पता नहीं है पर उन छोटी चीजों को समझती हूं, जो उसके पापा बुलाने के लिए बनाते थे. मैं अपनी मां का सिरदर्द हूं, उनकी जिद्दी, लापरवाह, उनकी मूडी बच्ची हूँ. मैं उन्हीं का एक रिफ्लेक्शन हूँ. मैं अपनी बहन के लिए पॉप कल्चर की गाइड हूं. उसके साथ किसी बड़े मैच में उसके साथ झड़गने वाली दोस्त भी. मैं वो लड़की हूं जो लेक्चर में क्लास में पहली बेंच पर बैठती है क्योंकि उस लड़की टीचर के साथ हर विषय पर बहस करना होता है. सब कुछ, क्योंकि इससे साहित्य और मजेदार हो जाता है. मुझे लगता है कि मुझे मेरे दोस्त पसंद करते हैं. वे कहते हैं मेरा सेंस ऑफ़ ह्यूमर बेतुका है पर कुछ जगहों पर काम भी कर जाता है. किताब और कविता मुझे सुकून देते हैं.
मुझे किताबों से प्यार है. मेरे घर की लाइब्रेरी किताबों से भरी हुई है. पिछले कुछ महीनों से मैं यह भी सोच रही हूं कि मम्मी को लैंप और फोटोज दूसरी जगह रखने के लिए बोलूं , ताकि और जायदा किताबों की जगह बन सके.
मैं आदर्शवादी हूं. एक एथलीट हूं. मैं युद्ध के खिलाफ़ हूं. मैं आपके हिसाब से उग्र और युद्ध का विरोध करने वाली बेचारी सी नहीं हूं. मैं युद्ध नहीं चाहती क्योंकि मुझे इसकी कीमत का अंदाजा है. मैं जानती हूँ कि यह बहुत महंगा है. यकीन करो, मैं बेहतर जानती हूं क्योंकि मैंने हर दिन इसकी कीमत चुकाई है. आज भी चुका रही हूं. और इसकी कोई कीमत नहीं है. अगर कीमत होती तो कुछ लोग मेरे से इतनी नफरत नहीं कर रहे होते.
न्यूज़ चैनल्स चिल्लाते हुए पोल करा रहे थे, “गुरमेहर का दर्द सही है या गलत?” यदि 51 प्रतिशत लोग सोचते हैं कि मैं गलत हूं, तो मैं जरूर गलत हूं. इस हाल में भगवान ही जानता है कि कौन मेरे मन को दूषित कर रहा है.
पापा अब मेरे साथ नहीं हैं. वो पिछले 18 सालों से साथ नहीं हैं. 6 अगस्त 1999 के बाद मैंने अपने 200 शब्दों के लिमिटेड शब्दकोष में कुछ और शब्द सीखे. ये शब्द थे मौत, युद्ध और पाकिस्तान. मुझे उनके छिपे हुए मतलंब समझने में साल लग गए. छिपे हुई इसलिए कह रही हूं क्योंकि किसी को इनका मतलब पता है? लेकिन मैं जीए जा रही हूँ और इनके छिपे हुए अर्थों का मतलबी जानने की कोशिश कर रही हूँ.
मेरे पापा शहीद हुए लेकिन मैं उन्हें शहीद के तौर पर नहीं जानती. मैं उन्हें एक ऐसे इंसान के रूप में जानती हूं जो कार्गो की बड़ी जैकेट पहनते थे, जिनकी जेब में मिठाईयां होती थी. जब वो मेरे माथे को चूमते थे तो उनकी उबड़ खाबड़ दाढ़ी मुझे चूब जाती थी. मैं उस आदमी को जानती हूं जिसने मुझे च्यूइंगम दिलाया, जिसने मुझे स्ट्रॉ से पीना सिखाया . मैं उस आदमी को जानती हूं जिसका कंधा मैं बड़े जोर से पकड़ती थी ताकि वे मुझे छोड़कर न जाए. वे चले गए और फिर कभी वापस न लौटे.
मेरे पिता शहीद हैं. मैं उनकी बेटी हूं.

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