लेख/मंथन

लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ पत्रकारिता नहीं, हत्या है/लेखिका: हरप्रीत कौर

70 साल की आज़ादी पर आज मुझे गुरूर हो रहा है, मुबारक हो हम इंसान से जिंदा लाशों में तब्दील हो गए हैं, हम मौतों पर जश्न मनाने वाले अघोरी हैं, हम इंसानों का खून पी कर  झूमने वाले वहशी है, जंगलों से  जानवर ख़त्म हो रहे हैं तो क्या ? अब इंसान ही जानवरों की कमी को पूरा कर रहा है,  क्योंकि हम सभ्य हो रहे हैं… ये सभ्यता सोशल साइट्स पर सबसे ज़्यादा है और ये तहज़ीब अपने चरम पर पहुंच जाती है जब हम किसी औरत की बात सोशल मीडिया पर करते हैं, तब नई नई गालियां इजाद की जाती हैं मुझे तो लगता है जैसे कोई प्रतियोगिता हो कि कौन सबसे भद्दी गाली देगा, उसे ही सोशल साइट्स का सरताज बनाया जायेगा और इनाम के तौर पर इन्हें मिलेंगे इनके फ़ॉलोअर्स जो देश के जाने माने लोग होंगे….

 इसी भारत के लिए भगतसिंह, राजगुरू ने अपनी जान दी होगी…फाँसी पर झूलते हुए उन्हें ये ज़रा भी न सूझा होगा कि जिस भारत की आज़ादी के लिए वो अपनी जान क़ुर्बान कर रहे हैं, वो आज़ादी इस देश के बाशिंदों को कभी नसीब नहीं होगी…बाबा साहब ने संविधान की परिकल्पना के लिये दो सालों तक मेहनत की तब जाके कहीं हमें इतने विशाल लोकतंत्र की इमारत हासिल हुई जिसने हमारे राष्ट्र को दुनिया के नक्शे पर उभारा लेकिन अब इस इमारत का सिर्फ ढांचा ही बाक़ी है, ये वो इमारत है जो गिरेगी तो पूरी मानवता को अंधेरे गर्त में पहुंचा देगी काश के वो जान पाते कि इन कानूनों से इस देश की रियाया को कभी आज़ादी नहीं मिलेगी बल्कि इनका इस्तेमाल करने पर मौत की अंधेरी दुनिया में खो जाना होगा, 

पत्रकारिता को लोग चौथा स्तंभ मानते हैं, लेकिन अब ये पुरानी बात हो गई, भारत के संविधान का  चौथा स्तंभ अब हत्या करना है, कभी मज़हब के लिए हत्या, कभी झूठी शान के लिए हत्या और कभी सच बोलने पर हत्या, भारत अब मौत के घाट उतारने में दुनिया की ज़ुबान पर है
बुद्धिजीवी बता रहे हैं कि आज का समय तो आपातकाल से भी भयानक है जब इंसान को अपनी ज़ुबान पर ताला लगा कर रखना होगा, हमें अपने होंठों को सी लेना होगा अगर हम सरकार से अलग राय रखते हैं तो हमें बोलने का अधिकार नहीं है…..

अगर सरकार को तानाशाह ही बनना है तो लोकतंत्र का ये दिखावा किसलिए? आजकल तो लोग सोशल मीडिया और ट्विटर पर बैठे बैठे ही जंग जीत लिया करते हैं किसी हथियार की ज़रूरत ही नहीं, आप खुद को सभ्य बताते हुए बातों बातों में ही किसी का भी बलात्कार कर सकते हैं और इसे देश के लिए ज़रूरी भी बता सकते हैं
 गालियाँ तो आजकल सोशल मीडिया की जान ही समझिए, अगर आपको गाली  देने में महारत हासिल नहीं है तो आपसे हाथ जोड़कर इल्तजा है कि सोशल मीडिया आपके लिए नहीं है, आप किसी छोटे-मोटे aaplication से काम चलाइए, फ़ेसबुक और ट्विटर जैसे दिग्गज एप्लिकेशन जिनकी पहुंच दुनिया भर में हो यकीन जानिए आप इनके लायक़ नहीं…..
हम महिला सुधारों की बात करते है अभी हाल ही में कोर्ट का बहुत बड़ा फैसला महिलाओं के हक़ में आया, महिलाओं के हक़ हुक़ूक़ के लिए दिन रात गला फाड़ कर चिल्लाने वाले एक औरत की हत्या पर खुश होते हैं, एक औरत से जन्म लेकर, एक औरत से राखी का धागा बंधवाकर, एक औरत को बेटी के रूप में पाकर उसी औरत को गालियाँ देकर अपनी सड़ी गली सोच की नुमाइश करते है,

 हमारा देश बदल गया है या कुछ ऐसा है जिसे बदलने की कोशिश की जा रही है, जो बोलेगा उसे गालियों के तेज़ धारदार हथियार से छलनी कर दिया जायेगा, जब दो महिलाओं ने राम रहीम की सच्चाई बताई तब किसी ने उस पाखंडी बाबा को भद्दी गालियां नहीं दी, लोग तो उसे बचाने के लिए एक दूसरे की जान लेने पर आमादा हो गए, वहीं जब एक औरत सिर्फ अपने विचार लोगों के सामने रखती है तो उसे गोलियों से छलनी कर दिया जाता है,  उसके बाद तो लोगों ने नई नई गालियों की होली खेली है…

हिंदू मुस्लिम की ये राजनीति हमें हैवान बना रही है लोग अगर असभ्य हैं तो अपने ज़ेहन को साफ करें बाज़ार में हार्पिक बहुत आसानी से मिलता है अगर आपकी ऊँची शिक्षा ये नहीं कर पा रही तो एक बार ज़रूर इस उत्पाद का प्रयोग करे यकीन जानिए इससे सोच के कीड़े  भी साफ हुआ करते हैं…..

    

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