लेख/मंथन

जाएं तो कहाँ जाएं ; रोहिंग्या मुस्लिमों  का दर्द/ हरप्रीत कौर की कलम से

रहने को घर नहीं, सोने को बिस्तर नहींये गीत ज़ेहन में बार बार सवाल उठा रहा है, क्या हो जब न ज़मीन अपनी हो न आसमान,  क्या हो जब कोई हमारे पैरों तले से ज़मीन ही खींच ले,  जब मालूम हो जिस देश में हम दशकों से रहते हुए भी उसके नागरिक नहीं, पीढ़ियों से उस देश की मिट्टी को अपने ख़ून पसीने से सींचने के बाद भी वो मुल्क़ हमारा नहीं, क्या हो जब पता चले कि हमारे पास किसी देश की नागरिकता नहीं, कोई देश समाज जब आप के लिए परेशान ना हो शायद हम आलीशान घरों में सभी सहुलियतों  के साथ रहने वाले कभी इस बात को महसूस नहीं कर सकेंगे, ज़रा एहसास ही कर के देखिये तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं ना, ज़रा कल्पना ही करके देखते हैं कि हम कहीं के वासी नहीं, कोई देश हमें अपनाने को तैयार न हो,
ऐसी ही ख़ौफ़नाक ज़िन्दगी रोहिंग्या मुस्लिम जीने के लिए बेबस है वो इस वक़्त दुनिया के सबसे बुरे हालातों के शिकार हैं जब कोई भी देश उन्हें अपनाने को राज़ी नही, वो अपनी जान बचाने कहाँ जाए? क्या होगा उनके बच्चों का भविष्य, वो क्या कमाएंगे क्या खायेंगे, कहाँ पायेंगे वो दो गज़ ज़मीन जहाँ वो आख़िरी सांस ले सकेंगे, कहाँ की मिट्टी में वो खुद को मिट्टी कर जन्नत का सफ़र करेंगे,
म्यांमार से जान बचाकर आने वाले रोहिंग्या मुस्लिमों के लिए हमारे देश ने बहुत ही नकारात्मक रवैया अपना रखा है, ऐसा कई बार हुआ है जब के शरणार्थी भारत में शरण लेने आये हैं… और भारत ने उन्हें अपनाया भी है इतना ही नहीं अपनी दरियादिली दिखाते हुए उन्हें भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार भी दिये हैं,लेकिन रोहिंग्या मुस्लिमों के लिए शायद हम अपने दिल के कोनों में जगह नहीं बना पा रहे, क्या ये सिर्फ राजनीति या देश की सुरक्षा का मसला है या कुछ और ? या मज़हब का कीड़ा यहाँ भी अपना असर दिखा रहा है, रोहिंग्या के साथ लगा मुस्लिम शब्द शायद एक इंसान की जान के आगे भारी पड़ता मालूम हो रहा है,

म्यामांर से जो तसवीरें आ रही हैं, उन्हें देखकर इंसान होने पर शर्म आती है, इंसानियत का रेशा रेशा ख़ून में डूबा हुआ है, इतनी हैवानियत, इतनी क्रूरता वो भी बुद्ध के अनुयायियों में, सारी दुनिया जानती है बौद्ध धर्म करुणा और दया का प्रतीक है, लेकिन छोटे छोटे बच्चों के साथ ख़ून की होली कहाँ की करुणा है।
क्या हम सच मे धर्म को जीने वाले लोग हैं, क्या ये वही धर्म है जिसके लिए बुद्ध ने राजपाट छोड़ कर जंगलों में भटक कर, भूखे रहकर सच की तलाश की ,जिस बुद्ध ने अहिंसा, क्षमा, ब्रह्मचर्य, संयम, राग-द्वेष मुक्ति और समता को जिंदगी का अहम हिस्सा बताया….. उसी बुद्ध के नाम पर पहले की ही तरह आज एक बार फिर से बर्मा में हिंसक, और सांप्रदायिक किस्म के राजनीतिक प्रयास जोर-शोर से चल पड़े हैं. आज उसी बुद्ध के नाम पर मारो, भगाओ, खत्म करो, राज करो  के तेवर में कुछ वहशी सोच के धर्मिक गुरुओं के इशारों पर दरिंदगी के खेल खेले जा रहे हैं, जिन्हें इस हिंसक माहौल में हाथोंहाथ लिया जा रहा है.

आज जो रिलीजन वाले धर्म के नाम पर मजहब चल रहे हैं वे किसी जमाने में लोगों को अनुशासित और इकट्ठा करने के मकसद से बने थे. तब का समाज इंसान इंसान में बिखरा होगा तो उसका एक समाज बनाने में इन मजहबों ने उस जमाने में मदद की होगी. लेकिन आज जब हम सारी दुनिया को एक करने की बात कर रहे हैं, तब ये सारे पंथ तोड़ने वाले साबित हुए हैं. हिंदू और मुस्लिम, बौद्ध और ईसाई, शैव और वैष्णव – इस तरह आज टुकड़े-टुकड़े हो गए हैं
खोखली राजनीतिक अखबारी बयानबाज़ियों से अलग बुद्ध के नाम पर एक नए तरह का ख़ूनी आंदोलन तैयार हो चुका है, जिसकी बुनियाद ही मारकाट और खून है . बुद्ध के मूल अध्यात्मिक और मुक्तिपरक विचारों का न तो इन जाहिलों को कुछ ज्ञान है, और न ही वे इसे समझना चाहते हैं. इन शांति के कीडों ने बुद्ध को अपने हिंसक राजनीतिक आंदोलन का नेता बना दिया है.
अपनी जान जोखिम में डालकर कर कभी नाव से तो कभी गले तक पानी में चलकर आते ये लोग भी हमारी ही तरह अपने परिवारों की सुरक्षा चाहते हैं… इनकी तिनके तिनके बिखरती ज़िन्दगी के लिए दुनिया के देशों को आगे आना चाहिए…ये किसी धर्म की मजबूरी नहीं बल्कि इंसानियत की मजबूरी है कि इंसान अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा चाहता है…….

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