लेख/मंथन

राजनीति ने मुसलमानों से छीन लिया  राम का ‘इमाम-ए-हिन्द ‘ होने का दर्ज़ा: विश्लेषण

राम अल्लामा इक़बाल की नज़र में

लबरेज़ है शराबे हक़ीक़त से जामे हिन्द          

सब फ़लसफ़ी हैं खि़त्ता ए मग़रिब के राम ए हिन्द

यह हिन्दियों के फ़िक्र ए फ़लक रस का है असर
रिफ़अ़त में आसमां से भी ऊंचा है बामे हिन्द 
इस देस में हुए हैं हज़ारों मलक सरिश्त
मशहूर जिनके दम से है दुनिया में नाम ए हिन्द
है राम के वुजूद पे हिन्दोस्तां को नाज़
अहले नज़र समझते हैं उसको इमाम ए हिन्द
ऐजाज़ उस चराग़ ए हिदायत का है यही
रौशनतर अज़ सहर है ज़माने में शाम ए हिन्द
तलवार का धनी था शुजाअत में फ़र्द था
पाकीज़गी में जोश ए मुहब्बत में फ़र्द था
      –बांगे दिरा मय शरह उर्दू से हिन्दी, पृष्ठ 467, एतक़ाद पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली 2


शब्दार्थ- लबरेज़-लबालब भरा हुआ, शराबे हक़ीक़त-तत्वज्ञान, ईश्वरीय चेतना, आध्यात्मिक ज्ञान, खि़त्ता ए मग़रिब-पश्चिमी देश, राम ए हिन्द-हिन्दुस्तान के अधीन (‘राम‘ यहां फ़ारसी शब्द के तौर पर आया है जिसका अर्थ है आधिपत्य), फ़िक्र ए फ़लक रस-आसमान तक पहुंच रखने वाला चिंतन, रिफ़अत-ऊंचाई, बामे हिन्द-हिन्दुस्तान का मक़ाम, मलक सरिश्त-फ़रिश्तों जैसा निष्पाप, अहले नज़र-तत्वदृष्टि प्राप्त ज्ञानी, इमाम ए हिन्द-हिन्दुस्तान का रूहानी पेशवा, ऐजाज़-चमत्कार, चराग़ ए हिदायत-धर्म मार्ग दिखाने वाला दीपक, रौशनतर अज़ सहर-सुबह से भी ज़्यादा रौशन, शुजाअत-वीरता, पाकीज़गी-पवित्रता, फ़र्द-यकता, अपनी मिसाल आप 
गागर में सागर
अल्लामा इक़बाल की यह नज़्म ‘गागर में सागर‘ का एक बेहतरीन नमूना है। इस एक नज़्म की व्याख्या के लिए एक पूरी किताब चाहिए, यह एक हक़ीक़त है। मस्लन इसमें ‘शराबे हक़ीक़त‘ से हिन्दुस्तानी दिलो-दिमाग़ को भरा हुआ बताया गया है। इसे नज़्म पढने वाला पढ़ेगा और गुज़र जाएगा लेकिन इस एक वाक्य का सही अर्थ वह तब तक नहीं समझ सकता जब तक कि वह यह न जान ले कि ‘शराबे हक़ीक़त‘ होती क्या चीज़ है ?
विश्व गुरू है भारत
अल्लामा इक़बाल ने कहा है कि पश्चिमी दार्शनिक सब के सब भारत के अधीन हैं। इस वाक्य की गहराई जानने के लिए आदमी की नज़र पश्चिमी दर्शन पर होना ज़रूरी है और साथ ही उसे भारतीय दर्शन की भी गहरी जानकारी होना ज़रूरी है। तब ही वह अल्लामा के कथन की सच्चाई को जान पाएगा। उनका यह वाक्य केवल भारत का महिमागान नहीं है बल्कि एक तथ्य जिसे वे बयान कर रहे हैं। प्रोफ़ेसर आरनॉल्ड ने कहा है कि अल्लामा इक़बाल पूर्व और पश्चिम के सभी दार्शनिक मतों पर गहरी नज़र रखते थे। बांगे दिरा की शरह में प्रोफ़ेसर यूसुफ़ सलीम चिश्ती साहब ने लिखा है कि यूरोप के दार्शनिकों ने हिन्दुस्तानी फ़लसफ़े के विभिन्न मतों से जिन्हें इस्तलाह में ‘दर्शन‘ कहते हैं, बहुत कुछ इस्तफ़ादह किया है। (पृष्ठ 468)
राम शब्द की व्यापकता
‘राम ए हिन्द‘ वाक्य में उन्होंने एक अजीब लुत्फ़ पैदा कर दिया है क्योंकि यहां उन्होंने ‘राम‘ शब्द को एक फ़ारसी शब्द के तौर पर इस्तेमाल किया है। फ़ारसी में ‘राम‘ कहते हैं किसी को अपने अधीन करने को। इस तरह वे ‘राम‘ शब्द की व्यापकता को भी बता रहे हैं और यह भी दिखा रहे हैं कि ‘राम‘ केवल हिन्दी-संस्कृत भाषा और हिन्दुस्तान की भौगोलिक सीमाओं में बंधा हुआ नहीं है। 
निष्कलंक है राम का चरित्र
अल्लामा हिन्दुस्तानियों के चिंतन को ‘फ़लक रस‘ अर्थात आसमान तक पहुंचने की ताक़त रखने वाला बता रहे हैं और इसी की वजह से वे हिन्दुस्तान के मक़ाम को आसमान से भी ऊंचा कह रहे हैं। हिन्दुस्तान की शोहरत की एक वजह वे यह बता रहे हैं कि हिन्दुस्तान में केवल ऊंचे दर्जे का दर्शन ही नहीं है बल्कि सदाचार की मिसाल क़ायम करने वाले ऐसे लोग भी इस देश में हुए हैं जिनका व्यक्तित्व फ़रिश्तों जैसा निष्कलंक और निष्पाप था और उनकी तादाद भी दो-चार नहीं बल्कि हज़ारों है। 
अल्लामा इस भूमिका के बाद मर्यादा पुरूषोत्तम श्री रामचन्द्र जी का परिचय कराते हैं। वे कहते हैं कि उनके वुजूद पर हिन्दुस्तान को नाज़ है। ‘अहले नज़र‘ उन्हें ‘इमाम ए हिन्द‘ समझते हैं। इस वाक्य को समझने के लिए आदमी को पहले ‘अहले नज़र‘ और ‘इमाम‘, इन दो शब्दों के अर्थ को समझना पड़ेगा। ‘अहले नज़र‘ का शाब्दिक अर्थ तो है ‘नज़र वाले आदमी‘ लेकिन यहां ‘नज़र‘ से तात्पर्य आंख की नज़र नहीं है बल्कि ‘रूहानी नज़र‘ है। ‘अहले नज़र‘ से मुराद ऐसे लोग हैं जिन्हें ‘बोध‘ प्राप्त है, जो सही बात को ग़लत बात से अलग करके देखने की योग्यता रखते हैं। ‘इमाम‘ का शाब्दिक अर्थ तो ‘नेतृत्व करने वाला‘ होता है लेकिन यहां ‘इमाम‘ से मुराद है ‘रूहानी पेशवा‘ जो लोगों को सच्चाई और नेकी का रास्ता दिखाए। ‘इमाम ए हिन्द‘ का अर्थ यह हुआ कि उनका आदर्श सारे हिन्दुस्तान को सच्चाई और नेकी का रास्ता दिखा रहा है।
राम को पहचानने के लिए चाहिए ‘ज्ञानदृष्टि‘
हक़ीक़त यह है कि श्री रामचन्द्र जी को ‘इमाम ए हिन्द‘ केवल वही समझ सकता है जो ‘अहले नज़र‘ है। जो ‘अहले नज़र‘ नहीं है वह सही बात को ग़लत बात से अलग करके नहीं देखेगा और इसके दो ही नतीजे होंगे। 
1. अगर आदमी उनके बारे में लिखी गई बातों को ज्यों का त्यों सही मान लेगा तो वह उन्हें ईश्वर का अवतार अर्थात मानव रूप में स्वयं ईश्वर ही मान लेगा।
2. दूसरा नतीजा यह होगा कि वह श्री रामचन्द्र जी को औरतों और शूद्रों के साथ जुल्म और ज़्यादती करने वाला समझ बैठेगा। यह भी तभी होगा जबकि पाठक उनके बारे में लिखी गई हरेक बात को ज्यों का त्यों सही मान ले। दलित साहित्य में विशेषकर यही देखने में आता है।
राम मर्यादा पुरूषोत्तम थे, इमाम ए हिन्द थे
ये दोनों ही बातें ग़लत हैं। सच्चाई इनके दरम्यान है। श्री रामचन्द्र जी न तो ईश्वर थे और न ही कोई ज़ालिम या पक्षपाती राजा। वे ‘इमाम ए हिन्द‘ थे, वे हिन्दुस्तान के नायक थे, वास्तव में वे मर्यादा पुरूषोत्तम थे। अल्लामा इक़बाल द्वारा श्री रामचन्द्र जी को ‘इमाम ए हिन्द‘ कहा जाना यह सिद्ध करता है कि अल्लामा खुद भी ‘अहले नज़र‘ थे।
श्री रामचन्द्र जी के वुजूद पर हिन्दुस्तानियों को नाज़ है। यह सही है, हरेक आदमी यह दावा कर सकता है कि उसे भी उन पन नाज़ है, गर्व है क्योंकि साधारण हैसियत का आदमी अपनी किसी बात पर तो गर्व कर नहीं सकता। सो वह खुद को किसी बड़े आदमी से या किसी बड़ी चीज़ से जोड़ लेता है जिसकी बड़ाई को दुनिया मानती हो। इस तरह वह केवल अपने अहंकार को ही तुष्ट करता है लेकिन श्री रामचन्द्र जी केवल गर्व की चीज़ ही नहीं हैं बल्कि ‘इमाम ए हिन्द‘ भी हैं, वे अपने अमल से एक आदर्श भी पेश करते हैं जिसपर चलना अनिवार्य है। जो उनके मार्ग पर नहीं चलता वह उन्हें अपना आदर्श भी नहीं मानता। वह झूठा है, वह समाज को ही नहीं बल्कि खुद अपने आप को भी धोखा दे रहा है। 
मां-बाप की आज्ञाकारिता से मिलते हैं बुलंद मर्तबे
श्री रामचन्द्र जी के आदर्श में बहुत सी खूबियां हैं लेकिन सबसे ज़्यादा उभरी हुई खूबी है उनका आज्ञाकारी होना। केवल अपने पिता का ही नहीं बल्कि अपनी माता का भी और केवल अपनी सगी मां का ही नहीं बल्कि अपनी सौतेली मां का भी। वे चाहते तो अपने माता-पिता की आज्ञा नहीं भी मान सकते थे बल्कि उनके पिता राजा दशरथ ने तो उन्हें जंगल में जाने की आज्ञा दी ही नहीं थी, वे चाहते तो रूक सकते थे अयोध्या में लेकिन वे नहीं रूके। वे जंगल में चले गए। इस तरह उन्होंने भाइयों के बीच के उस आपसी टकराव को टाल दिया जो उनके बहुत बाद महाभारत काल में दिखाई दिया। आज भी भाई का भाई से टकराव एक बड़ी समस्या है, सिर्फ़ भारत में ही नहीं बल्कि सारे विश्व में। यह टकराव टाला जा सकता है लेकिन बड़े भाई को वन में जाना होगा। ‘बड़ा भाई‘ आज वन में जाने के लिए तैयार नहीं है लेकिन फिर भी कहता है कि उसे गर्व है श्री रामचन्द्र जी पर, अजीब विडम्बना है।
चराग़ ए हिदायत हैं राम
अल्लामा ने श्री रामचन्द्र जी को ‘इमाम ए हिन्द‘ कहने के बाद ‘चराग़ ए हिदायत‘ भी कहा है। ‘हिदायत‘ का शाब्दिक अर्थ तो ‘मार्गदर्शन‘ है लेकिन यहां ‘हिदायत‘ से उनका तात्पर्य ‘ईश्वर के धर्म का मार्ग दिखाने‘ से है। वे कहते हैं कि यह श्री रामचन्द्र जी के व्यक्तित्व का ही प्रभाव है कि आज जब भारत का वैभव पहले जैसा नहीं रहा तब भी हिन्दुस्तान की शाम भी ज़माने भर की सुबह की ज़्यादा से रौशन है, तेजोमय है।
अपनी खूबियों में बेमिसाल हैं राम
अल्लामा इक़बाल श्री रामचन्द्र जी को ‘फ़र्द‘ कहते हैं वीरता में, पाकीज़गी में और मुहब्बत में और वे उन्हें तलवार का धनी भी बताते हैं। ‘फ़र्द‘ उस आदमी को कहा जाता है जो किसी खूबी में अपनी मिसाल आप हो, वह खूबी उस दर्जे में उस समय किसी में भी न पाई जाती हो। अल्लामा ने तीन गुण उनके गिनाए हैं वीरता, पवित्रता और प्रेम। दरअस्ल अल्लामा ने तीन गुण नहीं गिनाए हैं बल्कि सारे गुणों का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन गुणों का ज़िक्र किया है। मस्लन वीरता से रक्षा करने का गुण भी जुड़ा हुआ है। पवित्रता के साथ ईश्वर और धर्म का बोध, कर्तव्य का बोध और निर्वाह भी लाज़िमी तौर पर जुड़ा हुआ है। प्रेम के साथ शांति और धैर्य भी स्वभाव में पाए जाएंगे क्योंकि इनके बिना प्रेम संभव ही नहीं है और प्रेमी त्याग और बलिदान के गुणों से युक्त भी मिलेगा क्योंकि प्रेम बलिदान मांगता है। जितना बड़ा बलिदान होगा उतना बड़ा दर्जा होगा प्रेम करने वाले का।
प्रेम और बलिदान से मिलती है अमरता 
इनसान को अमर करने वाली चीज़ वास्तव में बलिदान ही है। प्रेम एक जज़्बा है, जो दिल में छिपा रहता है, दुनिया उसे देख नहीं सकती लेकिन दुनिया बलिदान को देख सकती है। देखी हुई चीज़ को भुलाना आदमी के लिए मुमकिन नहीं होता। यही कारण है कि श्री रामचन्द्र जी के बलिदान को भुलाना हिन्दुस्तानियों के लिए आज तक मुमकिन न हो सका। उनका बलिदान कोई मजबूरीवश किया गया काम नहीं था क्योंकि अल्लामा इक़बाल उन्हें ‘तलवार का धनी‘ कहते हैं। ‘तलवार का धनी‘ एक मशहूर हिन्दी कहावत है जिसे वीर सैनिक के लिए बोला जाता है। श्री रामचन्द्र जी को मर्यादा पुरूषोत्तम बनाने वाले यही गुण हैं।
अच्छाई के प्रतीक हैं राम
ये गुण आज भी ज़रूरी हैं। इन्हीं गुणों की बदौलत वे भारतीय समाज में अच्छाई के प्रतीक बन गये हैं और उनके विरूद्ध लड़ने वाले रावण को बुरा और बुराई का प्रतीक माना जाता है। राम की सराहना होती है और रावण की निन्दा। राम जी की बारात और जुलूस निकाले जाते हैं जबकि रावण को जलाया जाता है हर साल। हर साल रावण को जलाने बावजूद भारतीय समाज में जुर्म और पाप लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। यह नज़्म अंग्रेजी शासन काल में लिखी गई थी और आज भारत आज़ाद है लेकिन तब से अब तक जुल्म और गुनाह में इज़ाफ़ा ही हुआ है। ऐसा क्यों हुआ ?
बुराई में इज़ाफ़ा क्यों हुआ ?
ऐसा इसलिए हुआ कि लोगों ने सिर्फ़ प्रतीक को जलाया, रावण को नहीं। लोग अपनों से प्रेम न कर सके, अपने लालच की बलि न दे सके, वे राम के रास्ते पर दो पग भी न धर सके। वे राममय न हो सके। जीवन में वे राम के पक्ष में न लड़ सके। नतीजा यह हुआ कि रावण के सैनिक बनकर रह गए और वे रावण को बलवान बनाते चले गए और उन्हें इसकी चेतना भी न हो सकी। यही कारण बना भारत के पतन का, उसके गौरव सूर्य के अस्त होने का। 
रामनीति से होगा भारत का पुनरूत्थान
भारत में ज्ञान की कमी नहीं है। हिन्दुस्तानी पात्र ‘शराबे हक़ीक़त‘ से लबालब भरा हुआ है। भारतीयों में संभावनाएं और योग्ताएं भी ऐसी हैं कि उनका चिंतन ‘आकाश‘ छू चुका है। जो पहले हो चुका है उसे फिर से दोहराना कुछ मुश्किल नहीं है लेकिन अपनी लड़ाई हमें आप लड़नी होगी। राम ने खुद संघर्ष किया, अब आपकी बारी है, आपको भी खुद ही संघर्ष करना होगा। संघर्ष तो करना ही होगा और हरेक इन्सान कर भी रहा है क्योंकि जीवन में संघर्ष के सिवा और है भी क्या ? लेकिन अगर वह संघर्ष रामनीति के तहत नहीं है, राम के पवित्र आदर्श को सामने रखकर नहीं किया जा रहा है तो वह रावण को बलशाली बना रहा है। वह राम के खि़लाफ़ लड़ रहा है और जो राम के खि़लाफ़ लड़ेगा वह कभी जीतने वाला नहीं क्योंकि वह राम के खि़लाफ़ नहीं बल्कि वास्तव में ईश्वर के खि़लाफ़ लड़ रहा है।
क्या है रामनीति ?
ईश्वर इस सारे ब्रह्माण्ड का राजा है। इन्सानों को उसी ने पैदा किया और उन्हें राज्य भी दिया और शक्ति भी दी। सत्य और न्याय की चेतना उनके अंतःकरण में पैवस्त कर दी। किसी को उसने थोड़ी ज़मीन पर अधिकार दिया और किसी को ज़्यादा ज़मीन पर। एक परिवार भी एक पूरा राज्य होता है और सारा राज्य भी एक ही परिवार होता है। ‘रामनीति‘ यही है। जब तक राजनीति रामनीति के अधीन रहती है, राज्य रामराज्य बना रहता है और जब वह रामनीति से अपना दामन छुड़ा लेती है तो वह रावणनीति बन जाती है। 
सत्य के लिए संघर्ष करना ही जिहाद है
सत्य और न्याय हरेक मनुष्य की चेतना का अखण्ड भाग है। जो आदमी सत्य और न्याय के लिए लड़ता है, दरअस्ल वह ईश्वर के लिए लड़ता है, जिहाद की वास्तविकता भी यही है और जो आदमी उसके खि़लाफ़ लड़ता है दरअस्ल वह सत्य और न्याय के विरूद्ध लड़ता है, वह सत्य और न्याय की रक्षा का नियम बनाने वाले ईश्वर के विरूद्ध लड़ता है। जो अपनी आत्मा के विरूद्ध लड़ता है, वह परमात्मा के विरूद्ध लड़ता है, परमेश्वर के विरूद्ध लड़ता है क्योंकि ईश्वर सत्य है और जहां कहीं भी सत्य है वह ईश्वर की ही ओर से है। जो प्रकट सत्य के विरूद्ध खड़ा होगा वह नज़र की पकड़ से बुलन्द महान सत्य को कभी पा नहीं सकता, उसका हरेक यज्ञ, उसका हरेक कर्म अन्ततः असफल हो जाएगा और उसे केवल अपयश ही दिलाएगा। रावण को भी यही मिला था और जो आज उसके गुणधारी बने हुए हैं उनका अंजाम भी इसके सिवाय कुछ होने वाला नहीं है और यही हो रहा है। 
प्रेम की शक्ति से प्रकट होते हैं राम
‘राम नाम मुक्ति देता है‘ यह सही बात है लेकिन कब और कैसे देता है यह राम नाम मुक्ति ?
राम का नाम राम की याद दिलाता है, उनके काम की याद दिलाता है। राम के नाम को उनके काम से जोड़कर देखना होगा और जब आपके सामने वैसी ही परिस्थिति आए तो आपको वही करना होगा जो कि श्री रामचन्द्र जी ने किया था। आप क्या खो रहे हैं यह नहीं देखना है बल्कि देखना यह है कि आप श्री राम को पा रहे हैं। श्री राम आपके दिल से निकल आपके कर्मों में प्रकट हो रहे हैं। प्रेम से ऐसे ही प्रकट होते हैं श्री राम। श्री राम ही क्या , एक प्रेमी अपने प्रेम की शक्ति से जिसे चाहे, जब चाहे प्रकट कर ले, लेकिन उसे देखने के लिए भी नज़र प्रेम की ही चाहिए। जिसके पास यह नज़र होती है उसे ही ‘अहले नज़र‘ कहा जाता है। जिसके पास यह नज़र नहीं है, वह अंधा है, वह ‘चराग़ ए हिदायत‘ की रौशनी से कुछ फ़ायदा नहीं उठा सकता। 

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