लेख/मंथन

जब बचेगी, तभी तो पढ़ेगी बेटी/ प्रीत बरार

मार्च का महीना याद आ रहा है, जब नए नए सी एम बने आदित्यनाथ योगी ने कहा था कि अब उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश बन कर रहेगा, उत्तर प्रदेश की बेटियां रात दस बजे भी इत्मिनान से घूम सकेंगी, तब मुझे भी लगा था कि शायद हम लड़कियों के दिन फिर गये हैं, हम बिना किसी मर्द की उंगली थामें, उन पर बोझ बने बाहर जाकर अपने काम कर सकते हैं,लेकिन दुख की बात है कि ऐसा नहीं हुआ बल्कि देश की आत्मा कहे जाने वाले शहर में लड़कियों की इतनी दुर्गति, वो भी तब के जब सरकार ने बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ को अपनी सरकार का सबसे बड़ा लक्ष्य बनाया हो,


ये उन बहादुर लड़कियों की हिम्मत ही कही जायेगी की किस तरह वो आगे आकर अपने खिलाफ रोजमर्रा की हिंसा को मुंहतोड़ जवाब देने बाहर निकली हैं. तमाम विश्व विद्यालयों में यौनिक संवेदनशीलता का मुद्दा भी उभर कर आ गया है. कहने को इसे लेकर नियम-कायदे और टीमें बनीं हैं लेकिन बनारस का आंदोलन बताता है कि ये इंतजाम कितने खोखले हैं और सिर्फ मसलों के पर्दे बन कर रह गए हैं,
 लड़कियों पर बुरी नजर है तो वे ही चेहरा ढक लें. उनसे बेअदबी की जाए तो वे नजरें झुका लें या किसी तरह अपनी जान बचाएं. शाम को दरवाजे बंद कर लें, रोशनी बुझा लें, सोचिए ये इस देश के किस हिस्से में नहीं हो रहा है.


 आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर दो मिनट में औरतों को किसी न किसी किस्म की हिंसा का शिकार बना दिया जाता है. घरेलू हिंसा से लेकर सार्वजनिक जीवन में अनेक किस्म की बर्बरताएं औरतों पर आमादा हैं, भारत अब उन संस्कारों और रिवायतों का देश बनता जा रहा है जहाँ लड़कियों को जन्म से ही रोका जाता है. देश के हर हिस्से में  लड़की कितनी सिमटी हुई है- पहनावे से लेकर बोलने तक, इसी तरह जब गुलमोहर कौर ने अपनी आवाज़ बुलंद करनी चाही थी तो उसे रेप तक कि धमकियां दी गयी,  बनारस जैसा पुराना, अपनी विरासत और तहज़ीब के लिए इठलाता शहर अपने  बनारसीपन के झूठे ठाठ में ये नहीं देख पाया कि उसके साए में लड़कियां कितनी असुरक्षित है,  शायद बनारस देख ही नही पाया कि उसकी तहज़ीब को उचक्कों ने निगल लिया है, और ये ही जगह जगह घिनोँनि मानसिकता की उल्टी करते फिरते हैं, 
 यूनिवर्सिटी में लड़कियां मस्ती के लिए नहीं, अपना जीवन और करियर बनाने आती हैं. उनके बारे में गलत सोच मत पालिए. जिन मर्दवादी रिवायतों के साथ अक्सर लड़के पले-बढ़े होते हैं, उन्हें वे गंदे विचार यूनिवर्सिटी में घुसने से पहले गंगा में बहा कर आना चाहिए. 


 पुरुषवादी अहम, सड़े गले रिवाज और इन सबसे मिलकर बने हमारे भारतीय समाज ने मर्दों को सेक्स के कीड़े में तब्दील कर दिया है. मसाला फिल्में, मानसिक भटकाव और सेक्स को लेकर आतुरता ने समाज को हैवान बना दिया है.

लेकिन पहला काम उनका सामाजिक सुधार का नहीं बल्कि पहला काम तो लड़कियों की हिफाजत का होना चाहिए, उन्हें हिदायतों और चेतावनियों से मत बांधिए. उनकी आजादी के लिए स्पेस बनाइये, उनसे चिपकने की कोशिश मत कीजिए,  सोच बदलिए, हंसना-बोलना, उठना-बैठना मत तौलते रहिए, लड़कियों को दोस्त, बहन, बीवी बनाइये, नाकि अपनी हवस का पुतला…..

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